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"मेरी व्यथा-कथा"

दो दिन पहले की बात बताऊँ, सबको अपनी व्यथा सुनाऊं,, हम बाल कटाने गए दुकान, भरपूर दिया नई ने सम्मान,, बोला-"बैठो भाई जान, किस तरह होगा कटिंग का काम,," हमने बोला-"करो उस-तरह, पहले कटवाए थे जिस तरह,," वो ससुरा कुछ अनपढ़ ठहरा, था शायद एक कान से बहरा,, उस-तरह को समझ उस्तरा, सर पे मेरे फेर दिया उस्तरा,, अब गंजे होकर लौटे हैं, और चादर तान के सोते हैं,, तब तक शकल किसे दिखलायें, जब तक बाल ये उग न जाएँ..!! By-( Doc Ravi Pratap Singh )

"एक बेटी"

बड़ी मन्नतों के बाद किसी के, घर में आती है एक बेटी, कभी मुस्काकर कभी तुतलाकर, रौनक फैलाती है एक बेटी,, फ्रॉक पहन माथे पर बिंदी, छम-छम करके चलती बेटी, पल भर में सब तोड़ खिलौने, घर-घर खेला करती बेटी,, माँ-बाबा दादा-दादी की, सबकी यही चहेती बेटी, रोज़ नए खेलों से अपने, सपने कई दिखाती बेटी,, कब ये वक़्त फिसल जाता है, पढने जाने लगती बेटी, राजकुमार मिलने के सपने, दिल में सजाने लगती बेटी,, पिता की चिंता बढ़ जाती है, घर में एक सायानी बेटी, माँ-बाबा की इज्जत अरमानो को,रखे संजो के रानी बेटी,, पिता करे वादा बेटी से, अपने से अच्छा घर ढूढेंगे, माँ दिलासा देती है कह कर, सौ में एक अनोखा वर ढूढेंगे,, होत दिखाई जब बेटी की, नहीं पसंद आने का डर, पसंद अगर आ भी जाये तो, मांग बड़ी होने का डर,, सभी डरों से मुक्त होते ही, बहू किसी की बन जाती बेटी, बाबुल का घर छोड़ के अब तो, नया घरोंदा बनाती बेटी,, दूजे के घर को अपना करने, लेके विदा चली जाती बेटी, घर सूना है द्वार है सूना, यादो में रह जाती बेटी,, वक़्त के साथ बदलता पहलु, पिता जी नाना बन जाते, वही चहल-पहल फिर आती है, जब बेटी संग आती बेटी..!! By-( Doc Ravi Prata...

आँसू रिश्ते और ख्वाब....

प्रिय मित्रों,  आँसू रिश्ते और ख्वाब,, टूटते हैं लेकिन छूटते नहीं..!! वो जो दर्द दफ़न किया था, दिल की गहरी खाइयों में,, आज फिर दिखने लगा है, मेरी ही परछाइयों में..!! एक सच जो न पिया जाता है, न उगला जाता है,, लाख रोकने के बावजूद, गले तक चला आ जाता है..!! आज फिर से ये लावा बनकर उबल रहा है,, सुनामी की लहरों की मानिंद मचल रहा है..!! फिर वही वीरान रातें आ खड़ी हैं उजाले की आस में,, फिर वैसे ही भटक रहा हूँ एक नींद की तलाश में..!! फिर ये कमीना दिल दोगला हो गया है,, प्यार बाँटते-बाँटते शायद खोखला हो गया है..!! कभी तो मीठे आश्वासनों से मुझे तसल्ली देता है,, और कभी-कभी कमबख्त सब सच उगल देता है...!! माँ, आज फिर तेरे प्यार की दरकार है,, तुझसे दो बूँद भी मिले तो स्वीकार है..!! ये तेरा प्रेम ही तो है.. जिसने हर हालात में जीना सिखा दिया, घाव कैसा भी हो, उसे सीना सिखा दिया..!! ये तेरा प्रेम ही तो है.. जिसने मेरी रूह को मुझसे मिला दिया, मेरी रूकती हुयी साँसों को फिर से चला दिया..!! जानता हूँ मजबूरी तेरी, पर यूँ न मुझपर कहर बरसा,, मुझसे चाहे बात न कर, पर प्यार के लिए और मत तरसा...!! ...

आंसू

आज मैंने अपने आंसुओं को बहुत समझाया, "क्यों भरी महफ़िल में तुमने फिर मुझे सताया,, अच्छे लगते हो तुम जब भी तन्हाई में आते हो, लेकिन भरी महफ़िल आकर मेरा मजाक क्यों बनाते हो,,!!" इसपर तड़पकर आंसुओं ने भी मुह खोला, थोडा सिसकते हुए एक आंसू बोला.. "हर वक़्त भावना-विहीन लोगों से घिरे रहना, शोभा नहीं देता ऐसी भीड़ को महफ़िल कहना,, आप अपना समझकर लोगों को जब व्यथा बताते हैं, लोग उसे मनोरंजन समझकर तालियाँ बजाते हैं,, ऐसी महफ़िल में जब भी आपको तनहा पाते हैं, ना चाहते हुए भी आपके पास चले आते हैं..!!" By- ( Doc Ravi Pratap Singh )  

नेता प्रकृति

कह रवि नेता प्रकृति, छोड़े कभी न ढंग,, जीत के बाद ही दिखता है, नेता का असली रंग.. नेता का असली रंग, नियत है इनकी खोटी,, मौका मिलने पर बेचें, मजदूरों की रोटी.. अपने नेता अच्छे हैं, नहीं है उनमें खोट,, उल्लू हैं हम लोग ही, जो देते उनको वोट.. घूस बिना न काम करें, दिखते हैं लाचार,, पैसे से इन्हें मिले एनर्जी, नस-नस में भ्रष्टाचार..!! By- Dr.Ravi (Diamond_Sword)

तब मैं कविता लिखता हूँ

जब देह बिके और रौंदी जाये रोटी के आभाव में,, जब बीते कोई बचपन ढाबों पर शिक्षा के आभाव में,, हाँ तब मैं कविता लिखता हूँ, तब-तब मैं कविता लिखता हूँ.. जब सच कहने पर होती जेल, अपराधियों को मिलती बेल,, भूखों की रोटी पर होता जब-जब ये सत्ता का खेल,, हाँ तब मैं कविता लिखता हूँ, तब तब मैं कविता लिखता हूँ.. जब ज्ञानी करते अज्ञान की बातें,और ढोंगी बाँटें टीवी पर ज्ञान,, जब मेहनत मजदूरी करे अपाहिज,और दिखे भिखारी कोई नौजवान,, हाँ तब मैं कविता लिखता हूँ, तब तब मैं कविता लिखता हूँ.. जब गाँव कोई शहरों की झुग्गी में, नित्य बसेरा पता है,, जब सबको रोटी देने वाला किसान, गोलियों से भूख मिटाता है,, हाँ तब मैं कविता लिखता हूँ, तब तब मैं कविता लिखता हूँ..!! उम्मीद है इस भ्रष्ट समाज में परिवर्तन जल्द ही आएगा,, अन्यथा मेरा भ्रष्टतंत्र से द्वंद पहले भी चलता था, आगे भी चलता जायेगा...!! (जय हिंद)-Dr. Ravi

मेरे देश की एक झलक

नव विहान का सूरज बनकर, चमके तेरा नाम, मरे-जिएँ आँखों में झलके तेरा रूप ललाम,, तुझमें खेले गाँधी गौतम,कृष्ण राम बलराम, दिन मढ़ता है सोना तन पर, लाली मढ़ती शाम,, छू न सके नापाक हाथ ये अपने चारों धाम, रावण मार पधारे जैसे, आज अवध में राम,, तेरा शहर स्वर्ग बन जाए, नंदनवन हो ग्राम, तेरा नाम बढ़ाएँगे हम, होकर भी बदनाम,,   मेरी भारत माता मेरा, तुझको शत-शत बार प्रणाम..!! (जय हिंद)